Poetry

وتظن أنك تعرف نفسك...هيهات...نفسك لغز كبير

ابتسم للجروح التي شقت روحك...من خلالها تسلل النور داخلك

Lied eines jungen Wachpostens (Lili Marleen)
1. Vor der Kaserne
Vor dem grossen Tor
Stand eine Laterne
Und steht sie noch davor
So woll'n wir uns da wieder seh'n
Bei der Laterne wollen wir steh'n
Wie einst Lili Marleen.
 
2. Unsere beide Schatten
Sah'n wie einer aus
Dass wir so lieb uns hatten
Das sah man gleich daraus
Und alle Leute soll'n es seh'n
Wenn wir bei der Laterne steh'n
Wie einst Lili Marleen.
 
3. Schon rief der Posten,
Sie blasen Zapfenstreich
Das kann drei Tage kosten
Kam'rad, ich komm sogleich
Da sagten wir auf Wiedersehen
Wie gerne wollt ich mit dir geh'n
Mit dir Lili Marleen.
 
4. Deine Schritte kennt sie,
Deinen zieren Gang
Alle Abend brennt sie,
Doch mich vergass sie lang
Und sollte mir ein Leids gescheh'n
Wer wird bei der Laterne stehen
Mit dir Lili Marleen?
 
5. Aus dem stillen Raume,
Aus der Erde Grund
Hebt mich wie im Traume
Dein verliebter Mund
Wenn sich die späten Nebel drehn
Werd' ich bei der Laterne steh'n
Wie einst Lili Marleen.

يا ليلى يا ضي القنديل

في ضي القنديل 
عند بوابة الثكنة العسكرية 
أتذكر ياحبيبتي
كيف اعتدتِ الانتظار 
لتقولي لي همسا حانيا:
"إني أحبك" !
يا ليلى ياضي القنديل

أكاد أسمعهم ينادون اسمي 
كي أعود إلى دوري في الخدمة
كي نفترق !
أخذتك بين ذراعيَّ
وضممتك إلى صدري 
وتحت ضوء ذاك القنديل الخافت
أبقيتك بين يديًّ 
ومنحنا قبلاتنا إلى ليلة هادئة 
يا ليلى ياضي القنديل

يطلقون الآن أوامرهم إيذانا بالإبحار 
سنبحر إلى مكان ما ...هناك
الكل أسير الثكنات 
كان ذلك فوق احتمالي
تنتظرين على قارعة الطريق 
أسمع وقع أقدامك 
لكن هيهات أن ألقاك 
يا ليلى يا ضي القنديل

ها أنا أرتاح في ذلك المأوى 
خلف خط النار 
ورغم تباعدنا 
ما تزال شفاهنا دانية 
تنتظرين قرب ضوء خافت لذاك القنديل 
وجهك الحلو يتبدى ..دليل 
وجهك الحلو يخطف أحلامي 
يا ليلى يا ضي القنديل

"Пойдемте в сад? Я покажу Вас розам..."

 

Ричард Шеридан

هل تأتين إلى الحديقة معي؟ سأعرف الزهور عليك !
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الشاعر الأيرلندي شيريدان (ق 19)

Я ПОМНЮ ЧУДНОЕ МГНОВЕНЬЕ

Я помню чудное мгновенье...
Я помню чудное мгновенье:
Передо мной явилась ты,
Как мимолетное виденье,
Как гений чистой красоты.

В томленьях грусти безнадежной
В тревогах шумной суеты,
Звучал мне долго голос нежный
И снились милые черты.

Шли годы. Бурь порыв мятежный
Рассеял прежние мечты,
И я забыл твой голос нежный,
Твои небесные черты.

В глуши, во мраке заточенья
Тянулись тихо дни мои
Без божества, без вдохновенья,
Без слез, без жизни, без любви.

Душе настало пробужденье:
И вот опять явилась ты,
Как мимолетное виденье,
Как гений чистой красоты.

И сердце бьется в упоенье,
И для него воскресли вновь
И божество, и вдохновенье,
И жизнь, и слезы, и любовь.

Александр Пушкин, 1825

اتذكر لحظة مدهشة

أَتَذَكّرُ لحْظَةً مُدْهِشَةً
حين تَجَلّيتِ أَمَامي
طَيْفًا وَامِضًا
عَبْقَريًا صَافِيَ الجَمَالِ
وفي حُزْنٍ مُتبَاطِئٍ بِلا أَمَلٍ،
وفي رَنِينِ صَخَبٍ هَائِجٍ،
لَامَسَ مَسَامِعِي صَوْتٌ نَاعِمٌ،
وارْتَسَمتْ في الخَيَالِ مَلَامِحٌ رَائِقَةٌ،
وتَنَاثَرَت أَمَامِي أَحْلَامُ الأمسِ
نَسِيتُ صوْتَكِ النَاعِمَ،
ومَلَامِحَكِ السَّمَاوِيّة.
في قَلْبِ التّيهِ، وعَتْمَةِ المَحْبَسِ
طَالَتْ - على غَيْرِ هُدَى - بي الأَيَّامُ
دُونَمَا وَرَعٍ. دُونَمَا إِلْهَام
دُونَ دَمْعٍ. دُون حَياةٍ، أو حُبّ.
ثُمَّ دَبَّتْ في رُوحِيَ حَيَاةٌ،
حِينَ تَجَلّيتِ أَمَامي 
طَيْفًا وَامِضًا
عَبْقَريًّا صَافِيَ الجَّمَالِ.
هَا هُوَ القَلْبُ يَخْفِقُ فَرَحًا،
فَفِي جَنَبَاتِهِ بَعْثٌ جَدِيدٌ
مِن وَرَعٍ وإلهامٍ،
حياةٍ، و دموعٍ، وحُبّ.

Я вас любил: любовь еще, быть может

Я вас любил: любовь еще, быть может,
В душе моей угасла не совсем;
Но пусть она вас больше не тревожит;
Я не хочу печалить вас ничем.
Я вас любил безмолвно, безнадежно,
То робостью, то ревностью томим;
Я вас любил так искренно, так нежно,
Как дай вам бог любимой быть другим.

 

Александр Пушкин, 1829 

حب بلا أمل

أحببتك سيدتي: وما تزال حياةُ في الحب
الحب سيدتي لم ينطفىء في روحي بعد
لا تجروء نفسي أن يشجيك منها شىء 
لذا..أحببتك سيدتي في صمت، بلا أمل 
تارة خجلا، وتارة تعصرني غيرتي 
أحببتك سيدتي.. حبا مخلصا رهفا 
عسى ربي أن يهديك حبيبا ولو غيري

ПОДРАЖАНИЕ КОРАНУ

Клянусь четой и нечетой,
Клянусь мечом и правой битвой,
Клянуся утренней звездой,
Клянусь вечернею молитвой:
Нет, не покинул я тебя.
Кого же в сень успокоенья
Я ввел, главу его любя,
И скрыл от зоркого гоненья?
Не я ль в день жажды напоил
Тебя пустынными водами?
Не я ль язык твой одарил
Могучей властью над умами?
Мужайся ж, презирай обман,
Стезею правды бодро следуй,
Люби сирот, и мой Коран
Дрожащей твари проповедуй.

Александр Пушкин, 1825

 من وحي القرآن

أقسمُ بالشفع والوتر
أقسمُ بالسيف ومعركة العدل
أقسمُ بنجوم الصبح الباكر
و بصلاة الليل القادم
لا....لم أهجرك 
وهل تركتُك يوما
وقد تحليتَ بوقار وسكينة
وهل تخليتُ عنك يوما
وقد كرمتُ رأسك 
وكنت لك ملجأ 
من الشر المحدق!؟
هل تراني أسقيتك 
في يوم الظمأ 
سراب الصحراء؟
هل تراني
نصرتُ فصاحة لسانك 
على رجاحة عقلك؟
تَجَاسَر
وأعرض عن الخادعين
والتمس واثقا
طريق الحق
كن لليتامي محبة
وبشر بقرآني 
كل الخائفين 

КАВКАЗ

Кавказ подо мною. Один в вышине
Стою над снегами у края стремнины;
Орел, с отдаленной поднявшись вершины,
Парит неподвижно со мной наравне.
Отселе я вижу потоков рожденье
И первое грозных обвалов движенье.

Здесь тучи смиренно идут подо мной;
Сквозь них, низвергаясь, шумят водопады;
Под ними утесов нагие громады;
Там ниже мох тощий, кустарник сухой;
А там уже рощи, зеленые сени,
Где птицы щебечут, где скачут олени.

А там уж и люди гнездятся в горах,
И ползают овцы по злачным стремнинам,
И пастырь нисходит к веселым долинам,
Где мчится Арагва в тенистых брегах,
И нищий наездник таится в ущелье,
Где Терек играет в свирепом веселье;

Играет и воет, как зверь молодой,
Завидевший пищу из клетки железной;
И бьется о берег в вражде бесполезной
И лижет утесы голодной водной...
Вотще! нет ни пищи ему, ни отрады:
Теснят его грозно немые громады.

Александр Пушкин, 1829

 القوقاز


القوقاز أمام ناظري..يمتشق السماء فريدا
أقف فوق الثلج، هنا على حافة الجندل 
وهناك، فوق قمة شاهقة بعيدة.. نسرٌ
يحلق في السماء ..ساكنا بقدر سكوني 
ها أنا أشهد ينابيع الميلاد ..
وبواكير انهيار الصخور المهيب 
من هنا ..ترتحل السحب تحتي 
وأمام عيني.. يتوالى سباق جنادل صخبة 
ودونها...جروف عارية صلدة 
وبأقدام الجروف طحالب نحيلة وشجيرات جفاف 
فإذا الأرض اخضوضرت بين أشجار حسان 
وإذا الطيور غردت وتراقصت غزلان 
ها هم الناس يتخذون من الجبال بيوتا
ويسوقون أغناما في منحدرات خفيضة
فيهبط الرعاة إلى وديان فسيحة
تارة تتهادى مياه نهر بين شطئان ظليلة 
وتارة يعربد نهر آخر في مراتع شرسة 
يزمجر ويعوي، كوحش هائج 
كأنه رأى فريسة من خلف قضبان قفص حديد
يضرب ضفتيه فكاكا بلا جدوى من الأسر 
وبموج جائع يلعق صخور ضفتيه
هيهات! لا يبلغ الوحش فريسة ولا تقر له نفس 
فيعود منكفئا في صمت مهيب

РОДИНЕ

Они глумятся над тобою,

Они, о родина, корят

Тебя твоею простотою,

Убогим видом черных хат...

Так сын, спокойный и нахальный, Стыдится матери своей -

Усталой, робкой и печальной

Средь городских его друзей,

Глядит с улыбкой состраданья

На ту, кто сотни верст брела

И для него, ко дню свиданья, Последний грошик берегла.

И.А. Бунин

1891

ها هم مجددا يستهزئون بك
أواه يابلدي...يعاقبون فيك طيبتك
يسخرون من بيوت فلاحينك الغارقة سوادا 
ابنك يابلدي ..ابنك
وقف هازئا وقحا
وسط رفاق المدينة
يهرب من عار أم جاءته 
متعبة ..خجلى. ...حزينة
يرمقك بابتسامة من الشفقة
أنت من جئت إليه مئات الأميال
تجرين قدميك تعبا ووهنا
لتمنحيه لعبة فقيرة تفرحه

ترجمتي المتصرفة لقصيدة "الوطن" بقلم إيفان بونين التي كتبها عام 1889، وهو حاصل على جائزة نوبل في الأدب عام 1933 ونص القصيدة يقول

СТРАНА

С фонарем обшарьте

​Весь подлунный свет!

Той страны - на карте

Нет, в пространстве - нет.

Выпита как с блюдца,-

Донышко блестит.

Можно ли вернуться

В дом, который - срыт?

Заново родися -

В новую страну!

Ну-ка, воротися

На спину коню

Сбросившему! Кости

Целы-то хотя?

Эдакому гостю

Булочник ломтя

Ломаного, плотник -

Гроба не продаст!

...Той ее - несчетных

Верст, небесных царств,

Той, где на монетах -

Молодость моя -

Той России - нету.

- Как и той меня.

М.И. Цветаева

Конец июня 1931, Мёдон

ترجمتي المتصرفة لقصيدة "البلد" التي كتبتها مارينا تسفيتايفا Марина Ивановна Цветаева في عام 1931 تتحسر فيها على روسيا بعد أن اضطرت للهجرة منها بعد الحرب الأهلية ووصول الشيوعيين إلى السلطة في أعقاب ثورة 1917 الاشتراكية.

القناديلُ في أيديكم...


فتشوا عنها إذًا..
في كل وهد مظلم
وكل ركن مُقمر
أترونها؟!...
لن تقابلكم على الخريطة
ولن تعرفوها في عالمكم

لقد ابتلعوها مرة واحدة

كيف نهتدي إليها؟
هل يعود المرء لبيت دُمر
ولم يعد له أطلال؟

أيعود الفارس
لصهوة جواد
أسقطه أرضا؟

تحسس عظامك
هل بقي منك بعد السقوط
شىء ؟!

لن يعطيك الخباز لتحيا
كسرة خبز 
ولن يسترك الحانوطي
بكفن عند الموت

هل ما تزالين يا بلدي
أرضا واسعة
ومملكة سماوية؟
أما تزال عملاتك النقدية
تحملني نقوشها لأيام الصبا؟

لا..
لم تعد تلك بلدي 
ولم أعد أنا..أنا 

***

Умом Россию не понять,
Аршином общим не измерить:
У ней особенная стать –
В Россию можно только верить.


Ф. И. Тютчев

28 ноября 1866

لا تحاول فهم هذه البلاد عقلا
ولا أن تقيسها بأمتار الأمم الأخرى 
فمن سماتها التي تستأثر بها عن غيرها 
أنه لا يمكنك سوى أن تقبل بها قلبا وإيمانا

الشاعر الروسي تيوتشيف متحدثا

عن بلاده عام 1866، وقد تصرفت في

الترجمة قليلا عن الأصل الروسي الذي يقول